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02 May, 2017
10:00
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आहार पर विचार

आहार से जुड़े मुद्दों की समझ पर पुनः विचार पर कार्यशाला

भोजन करने वालोँ को समझना होगा कि भोजन करना धरती में गढ़ा हुआ हैकि वह एक कृषियुक्त क्रिया है और हम भोजन कैसे करते हैं इस पर ही काफी हद तक यह आधारित है कि धरती का उपयोग किस तरह होता है। यह एक सरल तरीका है एक बहुत ही जटिल सम्बन्ध को दर्शाने का। ज़िम्मेदारी पूर्वक भोजन करने का अर्थ हैयथासंभव इस जटिल सम्बन्ध को समझना व व्यक्त करना।

 वेंडेल बेर्री, “आहार भोग रति

पृष्ठभूमि 

मनुष्य होने के नाते हम भोजन तो करते ही हैं। लेकिन आज की दुनिया मे हम में से अधिकतर लोग भोजन करने को एक उपभोग की क्रिया के रूप में देखते हैं न कि विभिन्न अंतरसंबंधोँ के ताने बाने में एक भागीदारी के रूप में। भोजन मनुष्य का आहार है ही, एक रति का स्रोत भी, पोषण व मैत्रीवयक्त करने का ज़रिया भी। परन्तु वह हमें प्रकृति, संस्कृति, इतिहास  व राजनीति के जटिल ताने बाने से भी जोड़ता है। परन्तु आज की बदलती दुन्य में हम आहार का चयन कैसे करें ?  हम आहार के मूल्य व गुणवत्ता को कैसे जाँचें ? इस  सब का क्या परिणाम है हमारे शरीर के स्वास्थ्य के लिए, व मानव समुदायोँ के और धरती माता के मांगल्य के लिए। खासकर वैश्वीकरण व बाज़ारी उदारीकरण के सन्दर्भ में, जब औद्योगिक कृषि का विस्तार हुआ है और आहार हमारे पास परिवर्तन व विक्रय की प्रक्रियाओं से गुज़रते हुए प्रस्तुत होता है। इन प्रश्नोँ के उत्तर स्पष्ट नहीं होते हैं !

कार्यशाला के बारे में:

इस 6 दिवस की कार्यशाला में हम भोजन के बारे मे उन तरीकोँ के मार्फ़त चिंतन व अनुभव करेंगे जिनसे हम प्रायः नहीँ करते हैं।  हम जो आहार गृहण करते हैं उसका उत्पादन कैसे होता है, कहाँ, किसके द्वारा और कब – इस तरह के प्रश्नोँ से हम जूझेंगे।

हमारे जीवन में व समकालीन दुनिया में जो आहार रूपी जटिल अंतरसम्बन्ध हैं उन्हें हम ‘आहार-कड़िओं’ (food chains) के ज़रिये जांचेंगे। इसमे हमारा उद्देश्य रहेगा औद्योगिक आहार-कड़ियोँ की मौलिक समझ बनाना ! इसके लिए हम कम्पनी-प्रधान कृषि व भोजन ‘निर्माण’ के उद्योगोँ, खनिज-ऊर्जा पोषित कृषि, विषैले ‘खाद्य’ रसायनों , प्रकृति के हनन व जीवनशैली जनित रोगोँ पर चर्चा करेंगे । हम यह समझाने का प्रयत्न करेंगे की औद्योगिक आहार-कड़ियाँ कैसे कार्यरत हैं? इसमें किसका लाभ व किसकी हानि? इससे हम कैसे प्रभावित होते हैं?

साथ ही हम औद्योगिक आहार-कड़िओं व वैकल्पिक सुस्थिर आहार-कड़िओं के भेद जांचेंगे!

हम रसैनिक व जैविक, ‘पैकेज्ड’ व ताज़े आहार में भेद जांचेंगे ! ज़्यादा स्वस्थ व स्थानीय आहार-कड़िओं में हम कैसे भागीदार हो सकते हैं ?  जिनकी ऊर्जा व सृजनशीलता से आहार की निर्मिती होती है (जैसे कि कृषक, धरती माता आदि ) उनके प्रति हम क्या आभार अनुभव कर सकते हैं ?  छोटे स्तर के खाद्य उत्पादन  व कृषक के न्यायसंगत आर्थिक लाभ बाबत व्यवस्था को हम कैसे बल प्रदान कर सकते हैं ?  स्थानीयकरण के किन  तौर तरीकोँ में हम भागिदार हो सकते हैं ? हम कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारा मल-मूत्र वापस मिटटी को पोषित करने मे लगे ? इन सभी प्रश्नों का खुलासा करने के लिए इस कार्यशाला में ये विषय सम्मिलित रहेंगे:​             ​

१.   मानव स्वास्थ्य की व्यापक समझ – आहार है क्या ? इसकी चिंता क्यों करें ?  उत्तम आहार क्या है ?

२.   आहारीय ज्ञान के स्रोत : परंपरा, आहार शास्त्र, संचार माध्यम आदि, पश्चिमीकृत खान पान, चिरकारी कुपोषण, ‘ठूसे फिर भी भूखे’, ‘प्रोसेस्ड’ खाद्यान्न बनाम औद्योगिक रूप से​ निर्मित ‘रिफाइंड’खाद्यान्न, ​दुनिया क्या खाती है, खुराक की प्रमुख विचारधाराएं !​

३.   आहार व सांस्कृतिक अभिप्राय: खाने के  तौरतरीके, सामाजिकता, कृतज्ञता

४.   भोजन पकाना: महत्व, भोजन पकाना: तौर तरीके व विधियों का ब्यौरा, देसी अनाज व ठोस अनाज, स्वस्थ बेकिंग, सामग्री व विधियां, रसोई का संयोजन, मेन्यू का प्रबंधन

​५.   प्रकृति के अंतरसंबंधों व हस्तक्षेपों को समझना (कृषि, प्रकृति, पर्यावरण) औद्योगिक खाद्य प्रणाली का इतिहास, भारत में कृषि का संकट व खाद्यान्न की राजनीति, उपनिवेशवाद व विकास का प्रतिमान, वैश्विक कॉर्पोरेट खाद्यान्न की राजनीति, खाद्यान्न व कृषि : दर बनाम मूल्य; लिंग, व उसका भोजन के उत्पादन से सम्बन्ध​ !​

६.   भोजन के वैकल्पिक आदान प्रदान के स्वरुप: अनुभव व प्रयोग: सम्बंधित पहलें व अभियान; पहाड़ों में परंपरागत कृषि व वन विद्या: परिवर्तन व चुनौतियाँ; सक़्वेर फुट गार्डनिंग !

कार्यप्रणाली:

समूह कार्य, चर्चाएं, प्रतिभागियों द्वारा प्रस्तुतियां, लघु पठन, फिल्में, पाकशास्त्र !

एक तरीका जिससे हम सब और ज़िम्मेदारी पूर्वक खा सकते हैं और वैकल्पिक आहार-कड़िओं को योगदान दे सकते हैं, वह है स्वयं के लिए, व अपने बच्चोँ व समुदायोँ के लिए पोषक व श्रेष्ठ भोजन के पकाने द्वारा। इस लिए इस कार्यशाला में रसोई एक केंद्र का स्थान रहेगा : टोलियों में हम भोजन की तैयारी व पकाने, सफाई आदि में भाग लेंगे, व इसके अतिरिक्त स्वस्थ बेकिंग व सौर्य कुकर में पकाना भी सीखेंगे।

हम इस पर भी चिंतन करेंगे कि किस तरह पकाना केवल आहार को शरीर के पोषण हेतु सज्जीकृत करना मात्र नहीं है – उसमे सम्मिश्रित है भोजन पकाने वाले की दृष्टि, व दूसरों के साथ भोजन पकाने,खाने व उसका आनंद उठाने की सामाजिक प्रक्रिया ।

यह कार्यशाळा किसके लिए है ?

यह कार्यशाला उन व्यक्तिओं के लिए है जो रूचि रखते है इन सभी सवालों और विषयों में जो ऊपर दर्शाए गए हैं।  ऐसे व्यक्ति जो विकल्पों पर प्रयोग कर रहे हैं स्वयं के जीवन में, या साथ छोटे समूहों में, शोधकर्ताओं, व्यवसायी, पोषक विशेषज्ञ और वह जो कार्य कर रहे हैं भोजन से जुड़े मुद्दों पर!

प्रतिभागीओं से अपेक्षाएं:

प्रतिभागियों से अपेक्षा रहेगी कि वे कार्यशाला में पूर्णकालिक प्रतिभागिता निभाएंगे व सकारात्मक आदान प्रदान व सह-शिक्षण के माहौल में योगदान देंगे। आपका नए विचारों, नए स्वादों, व नए अभ्यासों से परिचय हो सकता है; इस लिए पूर्वाग्रहमुक्त मस्तिष्क व जिव्हा लाएं। ध्यान रहे कि यद्यपि हम सब अपना भोजन पकाने में प्रतिदिन भागिदारी निभाएंगे, यह कार्यशाला भोजन पकाने मात्र पर (cooking class) नही है ।  आहार  पर​ विचार कार्यशाला भोजन से सम्बंधित विभिन्न पहलुओं से व्यापक परिचय प्रदान करेगी, व हमें अपनी समझ गहराने, व जिम्मेदारीपूर्वक खाने, अभ्यास बनाने के साधन प्रदान करेगी।

 कार्यशाला संचालक :

सुमी चंद्रेश व पति चंद्रेश (मानवजी ) के बच्चे कुदरत व अजन्म्य स्कूल के बाहर ही शिक्षा गृहण करते आये हैं। सुमी एक सृजनात्मक व्यक्ति हैं जो  सीखते रहने, बच्चोँ के सान्निध्य में रहने, व कूड़े-कबाड़ से नयी चीज़ें बनाने में विशवास रखती हैं।  इनकी जैविक बागवानी में भी रूचि है और वे काफी प्रयोगधर्मी हैं। भोजन पकाना उन्हें बहुत प्रिया है। वे पिछले 19 वर्षोँ से खोजती सीखती आयी हैं, और आनंदपूर्वक जीती हैं।

करुणा मोरारजी अपने पति विनीश गुप्ता व पुत्र नमन व पुत्री नीलोफ़र के साथ उत्तर पश्चिम कर्णाटक के एक गाँव मे रहती हैं। इनकी रूचि है ग्रामीण जीवन में, आहार सम्बंधित तौर तरीकोँ से प्रयोग में,जैविक बागवानी में, सादी सुस्थिर जीवनशैली में, व नयी चीज़ें सीखते रहने मे नमन व नीलोफ़र के साथ जो अभी सुखपूर्वक स्कूल की दीवारोँ के बाहर ही स्वशिक्षण में लगे हैं। करुणा ने इस प्रकार की कार्यशाला का संचालन पहले भी किया है, और तब उन्होँने पाया कि इसमें वे अपने वैकल्पिक शिक्षण, समाज शास्त्रीय सिद्धांतोँ, व आहार में रुचिओं को एक स्थान पर सम्मिलित कर पाती हैं।

सुमी व करुणा के अतिरिक्त कुछ अन्य विशेषज्ञ भी कुछ सत्रों में सम्बोधन / संचालन करेंगे।

भाषा:  यह कार्यशाला हिंदी व अंग्रेजी दोनोँ में होगी; प्रतिभागियों का दोनो भाषाओं से परिचय होना आवश्यक है ।

प्रतिभागिता शुल्क:  ​​रु.6000, 6 दिन की कार्यशाला के लिए, जिसमे भोजन व आवास, व कार्यशाला में उपयोग होने वाली सारी सामग्री शामिल है. आवश्यकता अनुसार, कुछ ​ ​सीमित छात्रवृत्तियां उपलब्ध रहेंगी।

इस कार्यशाला के लिए पंजीकरण ऑनलाइन करें फारम निचे भरे 

Thought For Food

A workshop to re-examine our understanding of food

Eaters must understand that eating takes place inescapably in the world, that it is inescapably an agricultural act, and that how we eat determines, to a considerable extent, how the world is used. This is a simple way of describing a relationship that is inexpressibly complex. To eat responsibly is to understand and enact, so far as one can, this complex relationship”.

Wendell Berry, “The Pleasures of Eating”

Background

As human beings, we have in common that we all eat. Yet, in today’s world, most of us think of eating only in terms of consumption of food, rather than as a way of participating in a web of relationships. Food sustains the human body, it can be a source of pleasure, and often a way to express nurture and community, but it also connects us to complex webs of ecology, culture, history, and politics.   But in today’s rapidly changing world, how do we assess the value and quality of food? On what basis do we make food choices? How has the food we eat been produced, where, by whom, when? What are the implications for the health of our bodies, and for the well-being of communities and mother earth? In the context of globalization and market liberalization, with the expansion of corporate agriculture, processing and retailing of foods that come to us from ever-growing distances, in ultra-processed and packaged forms, the answers to these questions are often unclear.

About the Workshop:

In this 6 day workshop, we will attempt to deal with some of these questions tracing the complex relationships that constitute food in the contemporary world and in our lives, from the micro-level of individual, everyday experiences and choices to the macro-level of global food politics. We will assess different ideologies of ‘good food’ from the perspective of human health, as well as from the perspective of social justice and ecological balance. We will critically assess the dominant model of food production through large-scale industrial agriculture and food processing. Is this model necessary to ‘feed the world’ or is it contributing to unprecedented lifestyle diseases, cultural degradation, extreme socio-economic inequality and displacement, and ecological devastation? If so, what can alternative, more sustainable food chains look like, and how can we be a part of them? Can we support small-scale food production and fair economic returns for farmers? Can we re-evaluate local food traditions and histories? Are there localization strategies we can participate in? How can we ensure that our ‘waste’ goes back to nourish the soil? Most importantly, we will consider what it might mean for each one of us to eat responsibly, and share strategies and tools for doing so.

Themes to be covered in the 6 day workshop:

  1. Holistic understanding of human health: What is food? What is good food? Why bother?
  2. Sources of food knowledge: tradition, nutritionism, media etc.; “Western diet” and chronic malnutrition, “Stuffed and Starved”; Processed foods vs. industrially engineered, refined foods; What the World Eats: Major ideologies of ‘diet’
  3. Food and cultural meaning; practices of eating, community, gratitude
  4. Cooking: Why it matters, Review of recipes, methods etc.; Healthy baking, ingredients and methods; Millets and other whole food ingredients; Organizing in the kitchen, menu-planning etc.
  5. Understanding human-nature relationship and interventions between farm and plate: History of industrial food regime, colonialism, development model; Global corporate food politics; Agricultural crisis and food politics in India; Price versus value of food, agriculture; Gender and food production
  6. Alternative models & challenges: exchange models with food: experiences and experiments; Agro-ecological initiatives, social movements, Square foot gardening; Traditional mountain agro-forestry: challenges and changes

Methodology: Group Work, Interactive sessions, Presentations, Film screenings and Cooking

An immediate practice through which we can begin to eat more responsibly and contribute to alternative food chains is by cooking nourishing and wholesome food for ourselves, our children, and communities. The kitchen will therefore be a central place in the workshop: in groups, we will participate in preparation and cooking of meals, clean-up, as well as additional demonstrations such as healthy baking and solar cooking. We will also reflect on how cooking is not only about healthy ways of processing food to sustain the body; it is also about the attitude of the cook while making food, and the social processes of preparing, eating and enjoying food happily together.

Who is the workshop for?

This workshop is for individuals interested in any and/or all of the questions and themes mentioned above. Those experimenting with alternatives in their own lives and with small communities, researchers, practitioners, nutritionists and those working around issues of food would find this workshop meaningful.

Expectations from Participants:

Participants will be expected to participate in the workshop full-time, and contribute to an environment of engaged sharing and co-learning. You may encounter new ideas, unfamiliar tastes and habits; please bring an open mind and palate. Please note that although we will all be participating in preparing our own food, this workshop is not a cooking workshop! Thought for Food offers a comprehensive introduction to food issues, and tools for deepening our understanding and practices of good food and responsible eating.

Workshop Facilitators:

Sumi Chandresh and her partner Chandresh (Manavji) have two children, Qudrat and Ajanmya, who are unschoolers.  Sumi is a creative person who believes in learning new things, likes to be with kids, and making things out of waste. She is interested in organic farming, and enjoys experimenting. Sumi loves cooking, that is her passion. She has been exploring and learning for the last 20 years, and loves to live life joyously.

Karuna Morarji lives with her husband, Vinish Gupta, and their son Naman and daughter Niloufer, in a village in north-west Karnataka. She enjoys rural living, experimenting with healthy cooking and food preparation, organic gardening, low-impact lifestyle, and learning alongside her children, who are also happy unschoolers. Karuna has conducted a similar workshop on food in the past, and found it an engaging way to bring together and share her interests in alternative education, critical social theory and food.

Apart from Sumi and Karuna, there will be a few other facilitators for specific sessions.

Language: The workshop will be conducted bi-lingually (Hindi/English); proficiency in both languages is required of participants.

Cost: Rs. 6000 for 6 days, inclusive of all onsite workshop costs: boarding, lodging, and all the materials used in the workshop.

To Apply please fill the form below: